वैदिक ज्योतिष में कुंडली के विशिष्ट भावों में शनि की स्थिति को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। कर्मठ और न्याय के स्वामी के रूप में विख्यात शनि का प्रभाव, जिस भाव में वह स्थित होता है और उसकी ग्रहीय शक्ति के आधार पर काफी भिन्न होता है। नीचे शनि के प्रथम, चतुर्थ और अष्टम भावों पर पड़ने वाले प्रभाव का विस्तृत विवरण दिया गया है, जिसमें मूल संस्कृत श्लोक और उनके अंग्रेजी अनुवाद शामिल हैं। 1. प्रथम भाव में शनि (लग्न/असेंट) संस्कृत श्लोक स्थितो विल्ग्ने यदि मंदधर्मी हीनस्तनुः स्यादतिदु